राष्ट्र हित पर चिंतन।

स्वयं चितंन करे


सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजो के प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पूरे देश मे बहसJ छिड़ गयी है और यह इल्जाम स्पष्ट हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के आंतरिक तंत्र में कही न कही कमी है।
अब यह सोचने का विषय है कि?

जो तांत्रिक खामिया है क्या यह मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा के आने के बाद हुई?
निश्चित तौर पर यह इल्जाम यही साबित कर रहे है जब से दीपक मिश्रा जी कार्यकाल संभाले है तब से यह असहमतियां उत्पन्न हुई है।
०क्या इन चंद 3 महीनों में कमियां आयी?
०क्या दीपक मिश्रा जी के आने से फैसले लेने में असुविधा बढ़ी?
०क्या आज के 4 महीने  पहले सब कुछ सही था ?
०क्या तंत्रात्मक गतिविधिया पूर्ण रूप से अपने आप मे स्पस्ट थी ?
अगर इन आत्म प्रश्नों पर गौर किया जाए तो सच्चाई कुछ और ही बया हो रही है?

कड़वा सच
जब कोई व्यक्ति अच्छा काम करने की प्रेरणा से आगे बढ़ता है तो कहि न कही प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से आस पास के लोग उसके निर्णय से प्रभावित होते है/और वही लोग प्रभावित होकर गलत और सही का निर्णय करने लगते है/
क्यों कि मोदी आज 03 वर्षो से आये है और देश का ये हाल आज के चंद वर्षो से गया जबाब मिलेगा नही।
अगर हम इतिहास देखे तो भारत देश आज के वर्षो पहले विश्व बाजार में 21% प्रतिशत बाजार में हिस्सो में शामिल था। और आज स्तिथि में 0.14% प्रतिशत आकर रुक गयी है कि यह चंद दिनों का कमाल है नही।
०जिस देश ने विश्व को कपड़ा पहनना ,बनाना सिखाया,
०जिस देश ने विश्व को खेती करना सिखाया,
०जिस देश ने शून्य का अविष्कार कर विश्व मे गणना करने आसान अस्त्र दिया।
अगर आज यह देश इस स्तर पर आ गया तो कही न कही पूरे तंत्र में कमियां थी।
मैं ये नही कहता कि तंत्र में कोई कमिया नही है?
मैं ये नही कह रहा है कि जो वरिष्ठ जजो का इल्जाम है गलत है?
लेकिन मैं यह जरूर कहूंगा कि किसी एक व्यक्ति पर पूरे तंत्र का प्रभाहित होने का आरोप मढ़ देना गलत है।अगर यह कहा जाए कि इन चार महीनों में तंत्र में कमी आयी तो गलत है।तंत्र कही न कही गलत जरूर है और आज से नही आदि से है।
क्यों कि अगर तंत्र गलत या लोकतंत्र से प्रभावित न होता तो फैसले लेने में इतने वक्त न लगते।
जो आतंकवादी घोषित हो उसे भी इस तंत्र के मध्य से 15 से 20 वर्ष जीने का अवशर मिल जाता है और तो और उनके लिए महंगे से महंगे वकील से वकालत कराई जाती हैं।करोड़ो सरकारी रोये व्यय किये जाते है।अगर तंत्र सही होता तो ये सब देखने को और कहने को न मिलता।और फैसले लेने में इतना वक्त न लगता।
अंत मे मैं बस इतना बताना चाहता हु की इस तरह जजों के प्रेस कॉन्फ्रेंस करना इतिहास में पहकी बार हुआ है जो कि निंदनीय है।कमिया जरूर है लेकिन इसका किसी व्यक्ति विशेष आरोप लगा देने गलत है।
निश्चित तौर पर मुख्य न्यायधीश श्री दीपक मिश्रा जी पैरो में बेसी डालने का यह एक विरोधी राजनीतिक स्टंट हो सकता है।विषय राष्ट्र के चिंतन को लेकर है।
माननीय मुख्य न्यायाधीश जी के द्वार लिए गए कुछ राष्ट्रहित में निर्णय।
०सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य किया।
०एफ आई आर की कॉपी 24 घंटे में वेवसाइट पर डालने का आदेश।
०याकूब मेनन की फांसी।
०प्रमोशन में आरक्षण पर रोक।

अगर ऐसे राष्ट्र हित मे लिए गए निर्णय से तंत्र प्रभावित होता है तो निशिचित यह एक सोची समझी रणनीत है जिससे की मुख्य न्यायधीश जी के पैरों में बेडी डाल कर उन्हें आगे को बढ़ने से रोक जा सके।
चिंतन का विषय है गौर से सोचे।
धन्यबाद।
प्रमोद कुमार पाण्डेय "प्रवीण"
उत्तर प्रदेश ,जिला-बस्ती

Comments

  1. Chintan ka vishay to hai hi akhir ham nyay palika pe ankh band kar viswas karte hai

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